मानसरोवर - à¤à¤¾à¤— 1
अलगà¥à¤¯à¥‹à¤à¤¾
ईदगाह
माà¤
बेटोंवाली विधवा
बड़े à¤à¤¾à¤ˆ साहब
शांति
नशा
सà¥â€à¤µà¤¾à¤®à¤¿à¤¨à¥€
ठाकà¥à¤° का कà¥à¤†à¤
घर जमाई
पूस की रात
à¤à¤¾à¤à¤•ी
गà¥à¤²à¥â€à¤²à¥€-डंडा
जà¥à¤¯à¥‹à¤¤à¤¿
दिल की रानी
धिकà¥â€à¤•ार
कायर
शिकार
सà¥à¤à¤¾à¤—ी
अनà¥à¤à¤µ
लांछन
आखिरी हीला
तावान
घासवाली
गिला
रसिक संपादक
मनोवृतà¥à¤¤à¤¿
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à¤à¥‹à¤²à¤¾ महतो ने पहली सà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ के मर जाने बाद दूसरी सगाई की तो उसके लड़के रगà¥à¤˜à¥‚ के लिये बà¥à¤°à¥‡ दिन आ गये। रगà¥à¤˜à¥‚ की उमà¥à¤° उस समय केवल दस वरà¥à¤· की थी। चैन से गाà¤à¤µ में गà¥à¤²à¥à¤²à¥€-डंडा खेलता फिरता था। माठके आते ही चकà¥à¤•ी में जà¥à¤¤à¤¨à¤¾ पड़ा। पनà¥à¤¨à¤¾ रà¥à¤ªà¤µà¤¤à¥€ सà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ थी और रà¥à¤ª और गरà¥à¤µ में चोली-दामन का नाता है। वह अपने हाथों से कोई काम न करती। गोबर रगà¥à¤˜à¥‚ निकालता, बैलों को सानी रगà¥à¤˜à¥‚ देता। रगà¥à¤˜à¥‚ ही जूठे बरतन माà¤à¤œà¤¤à¤¾à¥¤ à¤à¥‹à¤²à¤¾ की आà¤à¤–ें कà¥à¤› à¤à¤¸à¥€ फिरीं कि उसे अब रगà¥à¤˜à¥‚ में सब बà¥à¤°à¤¾à¤‡à¤¯à¤¾à¤-ही- बà¥à¤°à¤¾à¤‡à¤¯à¤¾à¤ नजर आतीं। पनà¥à¤¨à¤¾ की बातों को वह पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨ मरà¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾à¤¨à¥à¤¸à¤¾à¤° आà¤à¤–ें बंद करके मान लेता था। रगà¥à¤˜à¥‚ की शिकायतों की जरा परवाह न करता। नतीजा यह हà¥à¤† कि रगà¥à¤˜à¥‚ ने शिकायत करना ही छोड़ दिया। किसके सामने रोये? बाप ही नहीं, सारा गाà¤à¤µ उसका दà¥à¤¶à¥à¤®à¤¨ था। बड़ा जिदà¥à¤¦à¥€ लड़का है, पनà¥à¤¨à¤¾ को तो कà¥à¤› समà¤à¤¤à¤¾ ही नहीं; बेचारी उसका दà¥à¤²à¤¾à¤° करती है, खिलाती-पिलाती है यह उसी का फल है। दूसरी औरत होती, तो निबाह न होता। वह तो कहो, पनà¥à¤¨à¤¾ इतनी सीधी-सादी है कि निबाह होता जाता है। सबल की शिकायतें सब सà¥à¤¨à¤¤à¥‡ हैं, निरà¥à¤¬à¤² की फरियाद à¤à¥€ कोई नहीं सà¥à¤¨à¤¤à¤¾! रगà¥à¤˜à¥‚ का हृदय माठकी ओर से दिन-दिन फटता जाता था। यहाठतक कि आठसाल गà¥à¤œà¤° गये और à¤à¤• दिन à¤à¥‹à¤²à¤¾ के नाम à¤à¥€ मृतà¥à¤¯à¥ का संदेश आ पहà¥à¤à¤šà¤¾à¥¤
पनà¥à¤¨à¤¾ के चार बचà¥à¤šà¥‡ थे- तीन बेटे और à¤à¤• बेटी। इतना बड़ा खरà¥à¤š और कमानेवाला कोई नहीं। रगà¥à¤˜à¥‚ अब कà¥à¤¯à¥‹à¤‚ बात पूछने लगा? यह मानी हà¥à¤ˆ बात थी। अपनी सà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ लाà¤à¤—ा और अलग रहेगा। सà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ आकर और à¤à¥€ आग लगायेगी। पनà¥à¤¨à¤¾ को चारों ओर अंधेरा- ही- अंधेरा दिखाई देता था। पर कà¥à¤› à¤à¥€ हो, वह रगà¥à¤˜à¥‚ की आसरैत बनकर घर में न रहेगी। जिस घर में उसने राज किया, उसमें अब लौंडी न बनेगी। जिस लौंडे को अपना गà¥à¤²à¤¾à¤® समà¤à¤¾, उसका मà¥à¤à¤¹ न ताकेगी। वह सà¥à¤¨à¥à¤¦à¤° थी, अवसà¥à¤¥à¤¾ अà¤à¥€ कà¥à¤› à¤à¤¸à¥€ जà¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ न थी। जवानी अपनी पूरी बहार पर थी। कà¥à¤¯à¤¾ वह कोई दूसरा घर नहीं कर सकती? यही न होगा, लोग हà¤à¤¸à¥‡à¤‚गे। बला से! उसकी बिरादरी में कà¥à¤¯à¤¾ à¤à¤¸à¤¾ होता नहीं? बà¥à¤°à¤¾à¤¹à¥à¤®à¤£, ठाकà¥à¤° थोड़ी ही थी कि नाक कट जायगी। यह तो उनà¥à¤¹à¥€ ऊà¤à¤šà¥€ जातों में होता है कि घर में चाहे जो कà¥à¤› करो, बाहर परदा ढका रहे। वह तो संसार को दिखाकर दूसरा घर कर सकती है, फिर वह रगà¥à¤˜à¥‚ की दबैल बनकर कà¥à¤¯à¥‹à¤‚ रहे?
à¤à¥‹à¤²à¤¾ को मरे à¤à¤• महीना गà¥à¤œà¤° चà¥à¤•ा था। संधà¥à¤¯à¤¾ हो गयी थी। पनà¥à¤¨à¤¾ इसी चिनà¥à¤¤à¤¾ में पड़ी हà¥à¤ˆ थी कि सहसा उसे खà¥à¤¯à¤¾à¤² आया, लड़के घर में नहीं हैं। यह बैलों के लौटने की बेला है, कहीं कोई लड़का उनके नीचे न आ जाय। अब दà¥à¤µà¤¾ र पर कौन है, जो उनकी देखà¤à¤¾à¤² करेगा? रगà¥à¤˜à¥‚ को मेरे लड़के फूटीआà¤à¤–ों नहीं à¤à¤¾à¤¤à¥‡à¥¤ कà¤à¥€ हà¤à¤¸à¤•र नहीं बोलता। घर से बाहर निकली, तो देखा, रगà¥à¤˜à¥‚ सामने à¤à¥‹à¤ªà¤¡à¤¼à¥‡ में बैठा ऊख की गà¤à¤¡à¥‡à¤°à¤¿à¤¯à¤¾ बना रहा है, लड़के उसे घेरे खड़े हैं और छोटी लड़की उसकी गरà¥à¤¦à¤¨ में हाथ डाले उसकी पीठपर सवार होने की चेषà¥à¤Ÿà¤¾ कर रही है। पनà¥à¤¨à¤¾ को अपनी आà¤à¤–ों पर विशà¥à¤µà¤¾à¤¸ न आया। आज तो यह नयी बात है। शायद दà¥à¤¨à¤¿à¤¯à¤¾ को दिखाता है कि मैं अपने à¤à¤¾à¤‡à¤¯à¥‹à¤‚ को कितना चाहता हूठऔर मन में छà¥à¤°à¥€ रखी हà¥à¤ˆ है। घात मिले तो जान ही ले ले! काला साà¤à¤ª है, काला साà¤à¤ª! कठोर सà¥à¤µà¤° में बोली-तà¥à¤® सबके सब वहाठकà¥à¤¯à¤¾ करते हो? घर में आओ, साà¤à¤ की बेला है, गोरॠआते होंगे।
रगà¥à¤˜à¥‚ ने विनीत नेतà¥à¤°à¥‹à¤‚ से देखकर कहा— मैं तो हूठही काकी, डर किस बात का है?
बड़ा लड़का केदार बोला- काकी, रगà¥à¤˜à¥‚ दादा ने हमारे लिठदो गाड़ियाठबना दी हैं। यह देख, à¤à¤• पर हम और खà¥à¤¨à¥à¤¨à¥‚ बैठेंगे, दूसरी पर लछमन और à¤à¥à¤¨à¤¿à¤¯à¤¾à¥¤ दादा दोनों गाड़ियाठखींचेंगे।
यह कहकर वह à¤à¤• कोने से दो छोटी-छोटी गाड़ियाठनिकाल लाया। चार-चार पहिà¥à¤¯à¥‡ लगे थे। बैठने के लिठतखà¥à¤¤à¥‡ और रोक के लिठदोनों तरफ बाजू थे।
पनà¥à¤¨à¤¾ ने आशà¥à¤šà¤°à¥à¤¯ से पूछा- ये गाड़ियाठकिसने बनायी?
केदार ने चिढ़कर कहा- रगà¥à¤˜à¥‚ दादा ने बनायी हैं, और किसने! à¤à¤—त के घर से बसूला और रà¥à¤–ानी माà¤à¤— लाठऔर चटपट बना दी। खूब दौड़ती हैं काकी! बैठखà¥à¤¨à¥à¤¨à¥‚ मैं खींचूà¤à¥¤
खà¥à¤¨à¥à¤¨à¥‚ गाड़ी में बैठगया। केदार खींचने लगा। चर-चर शोर हà¥à¤† मानो गाड़ी à¤à¥€ इस खेल में लड़कों के साथ शरीक है।
लछमन ने दूसरी गाड़ी में बैठकर कहा- दादा, खींचो।
Mansarovar - Part 1 (Hindi)
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Book Details
Author(s)Premchand
PublisherSai ePublications
ISBN / ASINB00NDCO6M0
ISBN-13978B00NDCO6M6
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