बिहार प्राचीनकाल से ही संतों की कर्मभूमि रहा है। यही कारण है कि हजारों किलोमीटर की दूरी तय कर सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देवजी (1506 ई.) तथा गुरु तेग बहादुरजी (1666 ई.) बिहार आए। जहाँ-जहाँ गुरुजी ने प्रवास किया, वहाँ बाद के वर्षों में अनुयायियों ने उनकी स्मृति में गुरुद्वारे या संगत का निर्माण कराया, जो सिखों के लिए आस्था के केंद्र बने, वहीं पटना में पौष सुदी सप्तमी संवत् 1723 तदनुसार 26 दिसंबर, 1666 ई. को गुरु गोबिंद सिंह का आविर्भाव हुआ। लेखक को यह पुस्तक लिखने के दौरान जानकारी मिली कि केवल पटना में ही ऐतिहासिक गुरुद्वारे नहीं हैं, बल्कि सासाराम, औरंगाबाद, गया, नवादा, मुँगेर, भागलपुर, कटिहार, पूर्णिया, वैशाली तथा राजगीर में भी अत्यंत प्राचीन व ऐतिहासिक गुरुद्वारे और संगतें हैं।
इस पुस्तक का मुख्य उद्देश्य बिहार के ऐतिहासिक गुरुद्वारों की जानकारी समाज को देना है, ताकि अपनी समृद्ध परंपरा और मान्यताओं को हम जान सकें; उनके संरक्षण-संवर्धन के लिए जाग्रत् हो। बिहार राज्य में सिक्ख गुरुद्वारों एवं संगतों का प्रामाणिक तथा जानकारीपरक वर्णन इस पुस्तक में है।
श्रद्धा-आस्था और विश्वास के केंद्र गुरुद्वारों का अत्यंत रोचक और विस्तृत विवरण।
Bihar Ke Aitihasik Gurudware (Hindi Edition)
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Book Details
Author(s)Subodh Kumar Nandan
PublisherPrabhat Prakashan
ISBN / ASINB082FHXYM8
ISBN-13978B082FHXYM6
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