भगवान शिव की आज्ञा से लंकापति रावण द्वारा त्रेतायुग में विरचित इस महाग्रंथ में समस्त भौतिक समस्याओं के निवारण एवं असाध्य रोगों की चिकित्सा से सम्बंधित अचूक उपायों का वर्णन है। साथ ही यह रावण के पूर्वजों के जीवन पर प्रकाश डालने के साथ-साथ महामृत्युंजय-उपा.