Gaban (Hindi) (Hindi Edition)
Book Details
Author(s)Premchand
PublisherSai ePublications
ISBN / ASINB00IOS2IPU
ISBN-13978B00IOS2IP6
MarketplaceCanada 🇨🇦
Description
बरसात के दिन हैं, सावन का महीना । आकाश में सà¥à¤¨à¤¹à¤°à¥€ घटाà¤à¤ छाई हà¥à¤ˆ हैं । रह - रहकर रिमà¤à¤¿à¤® वरà¥à¤·à¤¾ होने लगती है । अà¤à¥€ तीसरा पहर है ; पर à¤à¤¸à¤¾ मालूम हों रहा है, शाम हो गयी । आमों के बाग़ में à¤à¥‚ला पड़ा हà¥à¤† है । लड़कियाठà¤à¥€ à¤à¥‚ल रहीं हैं और उनकी माताà¤à¤ à¤à¥€ । दो-चार à¤à¥‚ल रहीं हैं, दो चार à¤à¥à¤²à¤¾ रही हैं । कोई कजली गाने लगती है, कोई बारहमासा । इस ऋतॠमें महिलाओं की बाल-सà¥à¤®à¥ƒà¤¤à¤¿à¤¯à¤¾à¤ à¤à¥€ जाग उठती हैं । ये फà¥à¤¹à¤¾à¤°à¥‡à¤‚ मानो चिंताओं को हà¥à¤°à¤¦à¤¯ से धो डालती हैं । मानो मà¥à¤°à¤à¤¾à¤ हà¥à¤ मन को à¤à¥€ हरा कर देती हैं । सबके दिल उमंगों से à¤à¤°à¥‡ हà¥à¤ हैं । घानी साडियों ने पà¥à¤°à¤•ृति की हरियाली से नाता जोड़ा है ।
इसी समय à¤à¤• बिसाती आकर à¤à¥‚ले के पास खडा हो गया। उसे देखते ही à¤à¥‚ला बंद हो गया। छोटी -बडी सबों ने आकर उसे घेर लिया। बिसाती ने अपना संदूक खोला और चमकती -दमकती चीजें निकालकर दिखाने लगा। कचà¥à¤šà¥‡ मोतियों के गहने थे, कचà¥à¤šà¥‡ लैस और गोटे, रंगीन मोजे, खूबसूरत गà¥à¤¡à¤¿à¤¯à¤¾à¤‚ और गà¥à¤¡à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ के गहने, बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ के लटà¥à¤Ÿà¥‚ और à¤à¥à¤¨à¤à¥à¤¨à¥‡à¥¤ किसी ने कोई चीज ली, किसी ने कोई चीज। à¤à¤• बडी-बडी आंखों वाली बालिका ने वह चीज पसंद की, जो उन चमकती हà¥à¤ˆ चीजों में सबसे सà¥à¤‚दर थी। वह गिरोजी रंग का à¤à¤• चनà¥à¤¦à¥à¤°à¤¹à¤¾à¤° था। मां से बोली--अमà¥à¤®à¤¾à¤‚, मैं यह हार लूंगी।
मां ने बिसाती से पूछा--बाबा, यह हार कितने का है - बिसाती ने हार को रूमाल से पोंछते हà¥à¤ कहा- खरीद तो बीस आने की है, मालकिन जो चाहें दे दें।
माता ने कहा-यह तो बडा महंगा है। चार दिन में इसकी चमक-दमक जाती रहेगी।
बिसाती ने मारà¥à¤®à¤¿à¤• à¤à¤¾à¤µ से सिर हिलाकर कहा--बहूजी, चार दिन में तो बिटिया को असली चनà¥à¤¦à¥à¤°à¤¹à¤¾à¤° मिल जाà¤à¤—ा! माता के हà¥à¤°à¤¦à¤¯ पर इन सहà¥à¤°à¤¦à¤¯à¤¤à¤¾ से à¤à¤°à¥‡ हà¥à¤ शबà¥à¤¦à¥‹à¤‚ ने चोट की। हार ले लिया गया।
बालिका के आनंद की सीमा न थी। शायद हीरों के हार से à¤à¥€ उसे इतना आनंद न होता। उसे पहनकर वह सारे गांव में नाचती गिरी। उसके पास जो बाल-संपतà¥à¤¤à¤¿ थी, उसमें सबसे मूलà¥à¤¯à¤µà¤¾à¤¨, सबसे पà¥à¤°à¤¿à¤¯ यही बिलà¥à¤²à¥Œà¤° का हार था। लडकी का नाम जालपा था, माता का मानकी।
इसी समय à¤à¤• बिसाती आकर à¤à¥‚ले के पास खडा हो गया। उसे देखते ही à¤à¥‚ला बंद हो गया। छोटी -बडी सबों ने आकर उसे घेर लिया। बिसाती ने अपना संदूक खोला और चमकती -दमकती चीजें निकालकर दिखाने लगा। कचà¥à¤šà¥‡ मोतियों के गहने थे, कचà¥à¤šà¥‡ लैस और गोटे, रंगीन मोजे, खूबसूरत गà¥à¤¡à¤¿à¤¯à¤¾à¤‚ और गà¥à¤¡à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ के गहने, बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ के लटà¥à¤Ÿà¥‚ और à¤à¥à¤¨à¤à¥à¤¨à¥‡à¥¤ किसी ने कोई चीज ली, किसी ने कोई चीज। à¤à¤• बडी-बडी आंखों वाली बालिका ने वह चीज पसंद की, जो उन चमकती हà¥à¤ˆ चीजों में सबसे सà¥à¤‚दर थी। वह गिरोजी रंग का à¤à¤• चनà¥à¤¦à¥à¤°à¤¹à¤¾à¤° था। मां से बोली--अमà¥à¤®à¤¾à¤‚, मैं यह हार लूंगी।
मां ने बिसाती से पूछा--बाबा, यह हार कितने का है - बिसाती ने हार को रूमाल से पोंछते हà¥à¤ कहा- खरीद तो बीस आने की है, मालकिन जो चाहें दे दें।
माता ने कहा-यह तो बडा महंगा है। चार दिन में इसकी चमक-दमक जाती रहेगी।
बिसाती ने मारà¥à¤®à¤¿à¤• à¤à¤¾à¤µ से सिर हिलाकर कहा--बहूजी, चार दिन में तो बिटिया को असली चनà¥à¤¦à¥à¤°à¤¹à¤¾à¤° मिल जाà¤à¤—ा! माता के हà¥à¤°à¤¦à¤¯ पर इन सहà¥à¤°à¤¦à¤¯à¤¤à¤¾ से à¤à¤°à¥‡ हà¥à¤ शबà¥à¤¦à¥‹à¤‚ ने चोट की। हार ले लिया गया।
बालिका के आनंद की सीमा न थी। शायद हीरों के हार से à¤à¥€ उसे इतना आनंद न होता। उसे पहनकर वह सारे गांव में नाचती गिरी। उसके पास जो बाल-संपतà¥à¤¤à¤¿ थी, उसमें सबसे मूलà¥à¤¯à¤µà¤¾à¤¨, सबसे पà¥à¤°à¤¿à¤¯ यही बिलà¥à¤²à¥Œà¤° का हार था। लडकी का नाम जालपा था, माता का मानकी।









