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जयशंकर पà¥à¤°à¤¸à¤¾à¤¦ की कहानअ
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जयशंकर पà¥à¤°à¤¸à¤¾à¤¦ की कहानियाà¤-2 (Hindi Stories): Jaishankar Prasad Ki Kahania-2 (Hindi Stories)
Author
जयशंकर पà¥à¤°à¤¸à¤¾à¤¦
Publisher
Bhartiya Sahitya Inc.
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Book Details
Author(s)
जयशंकर पà¥à¤°à¤¸à¤¾à¤¦
Publisher
Bhartiya Sahitya Inc.
ISBN / ASIN
B00KWI0QFE
ISBN-13
978B00KWI0QF2
Sales Rank
#1,136,371
Marketplace
United States 🇺🇸
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Description
हिनà¥à¤¦à¥€ कथा-साहितà¥à¤¯ के विकास के पà¥à¤°à¤¥à¤® चरण में ही पà¥à¤°à¤¸à¤¾à¤¦ जी ने कविताओं के साथ कथा-साहितà¥à¤¯ के कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° में पदारà¥à¤ªà¤£ किया। उनकी सांसà¥à¤•ृतिक अà¤à¤¿à¤°à¥‚चि और वैयकà¥à¤¤à¤¿à¤• à¤à¤¾à¤µà¤¾à¤¨à¥à¤à¥‚ति की सà¥à¤ªà¤·à¥à¤Ÿ छाप के कारण उनके दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ रचित कथा-साहितà¥à¤¯ अपनी à¤à¤• अलग पहचान बनाने में पूरà¥à¤£à¤¤à¤ƒ सकà¥à¤·à¤® हà¥à¤†à¥¤ जयशंकर पà¥à¤°à¤¸à¤¾à¤¦ अपने समय के पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤—धरà¥à¤®à¥€ रचनाकार थे। à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥‡à¤¨à¥à¤¦à¥ यà¥à¤—ीन खà¥à¤®à¤¾à¤°à¥€ से मà¥à¤•à¥à¤¤ होकर उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने नाटक और कविता के कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° में ही नहीं कथा साहितà¥à¤¯ के कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° में à¤à¥€ पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— किया। 1926 से 1929 ई. के बीच पà¥à¤°à¤¸à¤¾à¤¦ के दृषà¥à¤Ÿà¤¿à¤•ोण में यथारà¥à¤¥ के पà¥à¤°à¤¤à¤¿ परिवरà¥à¤¤à¤¨ दिखाई पड़ता है। यह परिवरà¥à¤¤à¤¨ उनकी मूल सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¨à¤¾à¤“ं में कम संसार की पहचान के सà¥à¤¤à¤° पर ही अधिक हà¥à¤† है। साहितà¥à¤¯, समाज और मानव संसà¥à¤•ृति आदि उनके लिठअलग-अलग पà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¤¯ नहीं बलà¥à¤•ि पà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¤¯ शà¥à¤°à¤‚खलाà¤à¤ हैं। उनकी पà¥à¤°à¤®à¥à¤– समसà¥à¤¯à¤¾ है कि मनà¥à¤·à¥à¤¯ के बिना किसी विकृति और अवरोध के कैसे पूरà¥à¤£à¤¤à¤¾ पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ कर सकता है। कैसे वह अपनी मà¥à¤•à¥à¤¤à¤¿ के साथ-साथ दूसरों को मà¥à¤•à¥à¤¤ रख सकता है। वे पà¥à¤°à¤¾à¤°à¤®à¥à¤ से ही आननà¥à¤¦ को à¤à¤• मूलà¥à¤¯ मानकर चलते हैं और बà¥à¤¦à¥à¤§à¤¿ या विवेक को अपूरà¥à¤£à¤¤à¤¾ का कारण मानते हैं। कà¥à¤² मिलाकर पà¥à¤°à¤¸à¤¾à¤¦ जी का कथा साहितà¥à¤¯ उनकी सांसà¥à¤•ृतिक दृषà¥à¤Ÿà¤¿ और अनà¥à¤à¥‚ति पर रचना बोध के कारण हिनà¥à¤¦à¥€ कथा साहितà¥à¤¯ में चिरसà¥à¤®à¤°à¤£à¥€à¤¯ बना रहेगा।
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