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📖 Description
श्री रवीश कुमार अग्रवाल कई दशकों से साहित्य की पुनर्नवा सेवा में खुद को समर्पित किए हुए हैं। वे समाज में घट रही घटनाओं व आपबीती को रोचक तरीके से व्यंग्यात्मक व तीक्ष्णात्मक शैली में जिक्र करते हुए कहते हैं कि जीवन महज कुछ सुख भरी कांतियों से युक्त आभा न होकर, अनियोजित हजारों घटनाओं का गठजोड़ है जो एक लंबे अंतराल में निर्मित होता है। इसे महज सुख-दुख के नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए बल्कि इसमें अन्य परिभाषाएं भी तलाशी जानी चाहिए। प्रस्तुत गद्य रचना के 'जि़ंदगी: कल, आज और कल' खण्ड में बतौर लेखक व सामाजिक सरोकारों को नियमित करने के लिए कहते हुए नजर आते हैं। समाज में बेटियों की दशा और उसे बेहतर करने के बारे में कहते हैं, साथ ही सास-बहू सम्बन्धों व रिश्तेदारी पर भी सुझाव व रोचक जिक्र करते नजर आते हैं। इसके साथ ही वे पीडि़त व्यक्तियों का उपहास न करने की याचना करते हुए कहते हैं कि 'हर एक चेहरा सहमा हुआ है, आखिर तेरी बस्ती को हुआ क्या है?' पता तो लगाओ, क्या बात है? तो पता चला कि आज एक इंसान पर दुखों का पहाड़ टूटा हुआ है। -राजेन्द्र पंडित